Saturday, May 22, 2010

मेरी आँखें पथरायीं

बारिश से भीगी धरती से
उठती ये सौंधी महक
मिटटी की
तेरे बदन सी है
क्या तेरा तन
माटी नहीं है?
क्यों मेरी आँखें पथरायीं?

ये बंजर क्यों है?
आंधी में उड़ती हुई रेत
यहाँ मेघ
तुम क्यूँ नहीं बरसे?
राह तकते
बरसों बीते
मेरी आँखें पथरायीं

क्या तेरा तन माटी नहीं है?
रोते हुए रेत
फिर भी सूखे हैं
कण कण में बिखरे
सोचे यही
कब माटी में मिलकर
मिटटी बनूँगा
सोच सोच
मेरी आँखें पथरायीं

बिखरी हुई मेरी
कहानी को
क्या बारिश
बहा ले गयी
नदियों में बहते
सागर में मिलके
किनारे पड़ी रेत पर
तेरे पैरों की निशान
ढूँढ़ते ढूँढ़ते
मेरी आँखें पथरायीं

क्या बैरी बारिश ने
रेत पर
तेरे पैरों के निशान
मिटाए हैं
लेकिन उसका क्या जो
महक तेरी फिर भी
रेत को महका रही है
ऐ संगतराश !
एक मूरत इस रेत की बना दे
जिससे ताजमहल
की महक आये
बना ऐ संगतराश
रेत का ताजमहल
जिसे देखने को
मेरी आँखें पथरायीं !!

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House

Saturday, November 14, 2009

one rainy day

बारिश की आवारा बूँदें
मेरी तन की ज्वाला को
बरबस यूँही हवा नहीं देती
भीगे पत्तों में
पीला पत्ता भी है
जिसकी आह किसी को
सुनाई नहीं देती
बिखरे पत्ते ज़मीन पर
एक दूसरे से यही पूछते हैं
ये बहार मेरी नही
ये बादलों का कर्कश संगीत
मौत का सन्नाटा है
शाखों से टूटे इसलिए
कि रौंदे जाएँ
क्या यही हमारी
नियति है
क्या मेरी मौत इतनी
छोटी है
दो बूंदे भी नसीब नहीं
जिसकी चाहत थी
वो भी अब करीब नहीं
ये दुनिया का दस्तूर सही नहीं
लेकिन ये पीले पत्ते
बड़े जीवट हैं
इनका बिखरना नए
जीवन की आहट है
ये तो यूँही टूटेंगे
नए पत्ते
जीवन का मज़ा लूटेंगे !!

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House

Thursday, November 5, 2009

अनकही

बात करता हूँ मैं ख़ुद से
बात होती है
मुलाकात करता हूँ मैं ख़ुद से
मुलाकात होती है
मेरी फुर्सत मेरी कोशिश मगर
दिन रात होती है
काली स्याह रातों में
सितारों के नजारों की
जब दरकार होती है
बादल की छटा छा जाती है नभ में
और बरसात होती है
ये खुशबु फूल गुलाब की
हर प्रभात होती है
छुडा कर वो मेरा दामन
कांटे भी चुभोती है
पतवार का प्यार कलि से
काँटों को नागवार गुज़रती है
यही दस्तूर है शायद
कलि तो अली के
साथ होती है
बात करता हूँ मैं ख़ुद से
बात होती है !!

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House

Sunday, October 25, 2009

Fainting Star




आगे घनघोर अँधेरा है
सूरज चाँद को खा गया
और सूरज को खा गया अन्धकार
मेरी परछाई भी
अन्धकार में हो गई गुम
मेरी आवाज़ भी है सुन्न
बादल तारे भी
अन्धकार के आगोश में
हाहाकार ! ब्रह्माण्ड है शोक में !!

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House

भूल जा

अब तो अकेले में भी मुस्कुराने लगा हूँ
जाने क्या बात है सब दर्द छुपाने लगा हूँ
चाहता तो ऐसा मैं भी नहीं था
बातों में ज़माने की मगर मैं आने लगा हूँ
कहती है दुनिया तुझे भूल जाऊं
अपनी ही कही बातों को शायद भूल जाने लगा हूँ
उजालों में दिन के, ठोकर ही पायी है
चिरागों को घर के बुझाने लगा हूँ
सुनते थे मोहब्बत में खिल जाती हैं कलियाँ
काटों के ज़ख्म से मुरझाने लगा हूँ

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House

जलती बुझती बात

रात सारी रात देखी
जलती बुझती बात देखी
कहती मुझसे मेरी बातें
पल में कटती लम्बी रातें
आंखों में बहती बात देखी
काजल की बहती धारा
धधकती हुई बहती धारा
सूखी सी बरसात देखी
सूनी सूनी सांझ बोली
तारों की उड़ान बोली
रंगों की मुस्कान बोली
तेरी मेरी बात देखी
जलती बुझती बात देखी

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House

Saturday, October 24, 2009

लेकिन हर शाम दिल कहता है

जाने क्यों घर में विराना paata पाता हूँ
गलियों में भटकता हूँ और
आशियाना चाहता हूँ
होश वालों की भीड़ me में टकराता हूँ
और दीवानगी चाहता हूँ
बहारों में पलकर पतझड़ में
बिखर जाना चाहता हूँ
महफिलों में शायरों की ख़ुद को
अंजाना पाता हूँ
अंधी शाम की टिमटिमाती
लौ में
बुझ कर मिट जाना चाहता हूँ
तन की सीमायें तोड़कर मन के दायरों में
भटकना चाहता हूँ
लेकिन हर शाम दिल कहता है -
घर चलूँ !!

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House

Sunday, October 18, 2009

दीवाली के रंग है

दीपों की होली पर
दिल जलता क्यूँ है?
सीने में भरा लोहा
मोम की तरह
पिघलता क्यूँ है?

आज, रात जागेगी
अंधेरों से भागेगी
ये चाँद सितारों को
खलता क्यूँ है?

बारूदी इत्र जब
मदहोश करती है
नशीली रात को
गुमसुम बैठा भवर
मयखाने का पता
पूछता क्यूँ है?

सन्नाटे चिल्ला कर
ख़ुद से बात करते हैं
विरानो में आहट
गूंजता क्यूँ है?

मेरे दिन रैन जलते हैं
निराशा के झींगुर
पलते हैं
अंधी आँखे
ढूंढता क्यूँ है?

बिना तेल दीपक
बिना लौ भी
जलता है
रौशनी तो नही
अंधेरों में फ़िर भी
दिखता है
सूरज तू
ढलता क्यूँ है?

ऊंचाइयों के आयाम
छूकर
ओंधे मुहँ गिरता है
गिरने के लिए
फ़िर
संभालता क्यूँ है?

वक्त के चक्रवात से
फूटेंगी ग़म की
धाराएँ
बादल सूखे
आंखों में
बरसात क्यूँ है?

हँसता है कोई
रिश्तों के जनाजे पर
खुश था कोई
मुझे दफन करके
लाश पर मेरी
मातम क्यूँ है?

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House

Monday, September 7, 2009

Telescope

एक पाइप से
ज़िन्दगी झांकती है
यह पाइप नहीं
Telescope है

टिमटिम आँखें हैं इनमे
दो जिस्म अंगडाई
लेते हैं
एक पर्दा है
जाली वाला
उसके पीछे एक
बुलबुल है
वो गाती है
तो दूर तलक
आवाज़ की महक
सुनाई देती है
यह पाइप नहीं
Telescope है

जब आँखें शोर करती हैं
तब भोर भी
शोले बरसाती है
दो पंछी पंख
फैलाते हैं
उड़कर दूर जाने को
और धम्म से
नीचे गिर जाते हैं
यह पाइप नहीं
Telescope है

उसको क्या दिखता है
उसको क्या दिखना था
ये उसकी समझ
से पार है
वो तो बस चलने को
तैयार है
ये घुटन उसे
तडपाती है
पल पल उसे
डराती है
यह पाइप नहीं
Telescope है

उड़ने की कोशिश
में पंख उसके
टूट जाते हैं
जिंदगी को जिंदगी
से पहले जीने की
चाहत में
प्राण उसके
बिखर जाते हैं
यह पाइप नहीं
Telescope है

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House

Saturday, July 18, 2009

वार्तालाप

इक्कीसवी सदी ने पुछा हमसे
क्यों? कहाँ हो? क्या देखते हो?
मेरे साथ आओ सुनहले सपने देखो
समृद्धि उन्नति और ज्ञान देखो
हमने कहा - हम ''बीस'' में ही भले
इसी में बढे इसी में पले
हम वर्तमान में जीते हैं
रोटी खाकर जल पीते हैं
सुनहले सपने रहने दो
इन आंखों को बंद रहने दो !


चल मेरे साथ अब मत सोच
तुझे सम्पन्नता के दर्शन कराएँ
अधिक पाने की सोच जगाएं
संतोष ही परमसुख है
इसके आगे दुःख ही दुःख है
अब मुझे कहने दो
सिक्कों को चन्द रहने दो !


अरे ! पृथ्वी का है खेल सारा
ये है सभा प्यारा
नई धरती खोजना है
हमारी यह पहली योजना है
इस धरती के लिए युद्ध हुए
मनुष्य ने मनुष्य को मारा है
अधिक धरती होगी तो अधिक युद्ध होंगे
करोड़ों नर बलि होंगे
भूमि को बोझ सहने दो
मिटटी का खंड रहने दो !


चल उस दिशा में चले
जहाँ पुष्प ही पुष्प मिले
जहाँ बालू से आए सुगंध
जहाँ पवन चले मंद मंद
सूरज भी किरणों से नहलाये
नदियाँ भी चंचल संगीत सुनाएँ
नहीं नहीं ! क्षमा करें !
हमने देखा है बालू को सुखाते हुए
पवन को बहाते हुए
सूरज को जलाते हुए
नदी को दहाते हुए
पुष्प तो मुरझा जाते हैं
पीछे दुर्गन्ध छोड़ जाते हैं
विज्ञानं का घमंड रहने दो
विचारों को "कबंध" रहने दो !!

© आलोक, २००९
Chaat Vaat Khaalo!! Creative House